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Supreme God in Bhagavad Gita

In Bhagavad Gita Shri Krishan ji indicates towards some other God who in reality is the Supreme God.

The following shlokas in particular clearly indicate about some other God which Shri Krishan ji is referring to.

Bhagavad Gita Chapter 18, Verse (Shloka) 62

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्‌॥

हे भारत! तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण में जा। उस परमात्मा की कृपा से ही तू परम शांति को तथा सनातन परमधाम को प्राप्त होगा॥62॥

O scion of Bharata, surrender unto Him utterly. By His grace you will attain transcendental peace and the supreme and eternal abode.

Bhagavad Gita Chapter 15, Verse (Shloka) 4

ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥

उसके पश्चात उस परम-पदरूप परमेश्वर को भलीभाँति खोजना चाहिए, जिसमें गए हुए पुरुष फिर लौटकर संसार में नहीं आते और जिस परमेश्वर से इस पुरातन संसार वृक्ष की प्रवृत्ति विस्तार को प्राप्त हुई है, उसी आदिपुरुष नारायण के मैं शरण हूँ- इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके उस परमेश्वर का मनन और निदिध्यासन करना चाहिए॥4॥

Thereafter that Supreme God should be searched for, having gone where, devotees do not return (in birth-death) to this world i.e. attain the eternal salvation and the Supreme God, from whom the creation has originated since time immemorial.

Krishan ji says that I too am in the refuge of that Supreme God. In this way one should remember and worship that Supreme God with full determination.

Bhagavad Gita Chapter 15, Verse (Shloka) 17

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥

उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है एवं अविनाशी परमेश्वर और परमात्मा- इस प्रकार कहा गया है॥17॥

The Supreme God is someone else (other than the two above-mentioned Purushas (Gods), Kshar Purush and Akshar Purush in shlok 16), who is actually said to be the Eternal Supreme God. He only, by entering into the three loks (worlds), sustains everyone.

Bhagavad Gita Chapter 8, Verses (Shloka) 5 - 10

Krishan ji in these verses tells Arjun initially from verse 5-7 about the method of attaining himself and then in verses 8-10 about attaining the Supreme God.

Bhagavad Gita Chapter 8, Verse (Shloka) 5

अंतकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्‌ ।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥

जो पुरुष अंतकाल में भी मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे साक्षात स्वरूप को प्राप्त होता है- इसमें कुछ भी संशय नहीं है॥5॥

The speaker of Gita says that whosoever, at the time of death, leaves his body while remembering me, attains me. There is no doubt in this.

Bhagavad Gita Chapter 8, Verse (Shloka) 6

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्‌ ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥

हे कुन्ती पुत्र अर्जुन! यह मनुष्य अंतकाल में जिस-जिस भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर त्याग करता है, उस-उसको ही प्राप्त होता है क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहा है॥6॥

O Son of Kunti! at the time of death, whomsoever one remembers and quits his body, He attains that very state only. i.e. whichever God one remembers at the time of death, he goes to him.

Bhagavad Gita Chapter 8, Verse (Shloka) 7

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युद्ध च ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्‌ ॥

इसलिए हे अर्जुन! तू सब समय में निरंतर मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। इस प्रकार मुझमें अर्पण किए हुए मन-बुद्धि से युक्त होकर तू निःसंदेह मुझको ही प्राप्त होगा॥7॥

Therefore O Arjun! remember me all the time and at the same time fight as well. In this way by surrendering your mind and intellect in me, you will undoubtedly attain me.

Up to here Krishan ji is saying to Arjun that you will attain me. From here on Krishan ji explains to Arjun how one goes in to the refuge of some Other Supreme God

Bhagavad Gita Chapter 8, Verse (Shloka) 8

अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्‌ ॥

हे पार्थ! यह नियम है कि परमेश्वर के ध्यान के अभ्यास रूप योग से युक्त, दूसरी ओर न जाने वाले चित्त से निरंतर चिंतन करता हुआ मनुष्य परम दिव्य पुरुष को अर्थात परमेश्वर को ही प्राप्त होता है॥8॥

O Parth, He who meditates on the name of Supreme God with undivided attention and thinks of him constantly, attains the Supreme God (Param Purusham Divyam)

Bhagavad Gita Chapter 8, Verse (Shloka) 9

कविं पुराणमनुशासितार-मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः ।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्‌ ॥

जो पुरुष सर्वज्ञ, अनादि, सबके नियंता सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म, सबके धारण-पोषण करने वाले अचिन्त्य-स्वरूप, सूर्य के सदृश नित्य चेतन प्रकाश रूप और अविद्या से अति परे, शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमेश्वर का स्मरण करता है॥9॥

A worshipper, who remembers Supreme God (Sachidanandghan) Kabir (Kavim), the Eternal, Controller of all, Subtler than the subtlest, the Sustainer of all, Self-effulgent like the sun (i.e. possessing a bright body), beyond the darkness of ignorance,

Bhagavad Gita Chapter 8, Verse (Shloka) 10

प्रयाण काले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्‌- स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्‌ ।

वह भक्ति युक्त पुरुष अन्तकाल में भी योगबल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित करके, फिर निश्चल मन से स्मरण करता हुआ उस दिव्य रूप परम पुरुष परमात्मा को ही प्राप्त होता है॥10॥

That worshipper, who is endowed with bhakti, by the power (the earnings of naam jaap) of the meditation of naam, while leaving the body at the time of death, fixing his life air between the eyebrows, while doing the sumiran of naam, goes to that divine Supreme God only.

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