Kafir

Who is Kafir (Hindi - काफ़िर, Arabic - كافر)?

The word Kafir (Hindi - काफ़िर, Arabic - كافر) is highly prevalent in islam. It is used for a person who does not believe in islam. As a result whosoever does not believe in islam is considered a kafir by muslims. However this is not the reality. A person who does low deeds, is mean, abject and of despicable nature is considered a Kafir.

Bani from Granth Sahib Ji of Garib Das Ji Maharaj - Kafir Bodh

Garib Das ji has spoken numerous banis which have been compiled in to a Granth Sahib. Garib Das ji uttered these banis after he met Supreme God Kabir Sahib. Kabir Sahib gave the knowledge to Garib Das Ji Maharaj in order to spread his own knowledge. The gist is that the bani of Garib Das Ji Maharaj is actually the knowledge given by Supreme God Kabir Sahib.

What is the Meaning of word Kafir (Hindi - काफ़िर)?

Garib Das Ji Maharaj has given a vivid description of the word Kafir. He has described in detail about who is kafir. The bani of Garib Das Ji is in Hindi language and explains in detail the meaning of word kafir (in hindi).

The following speech describes the attributes of a Kafir

Kafir Bodh Garib Das Ji Kafir Bodh Garib Das Ji

काफ़िर बोध

काफ़िर बोध सुनो रे भाई, दोहूँ दीन बिच राम खुदाई।

काफ़िर सो माता दे गारी, वै काफ़िर जो खेले सारी।

काफ़िर कूड़ी साखि भरांही, काफ़िर चोरी खटया खांही।

काफ़िर दान यज्ञ नहीं करहीं, काफ़िर साधू संत से अरहीं।

काफ़िर तीरथ व्रत उठावैं, सत्यवादी जन निश्चय लावैं।

काफ़िर पिता बचन उलटाहीं, इतने काफ़िर दोजिख जाहीं।

सत्यकर मानों वचन हमारा, काफ़िर जगत करूँ निरबारा।

वै काफ़िर जो बड़ बड़ बोलै, काफ़िर कहो घाटि जो तोलै।

वै काफ़िर ऋण हत्या राखे, वै काफ़िर पर दारा ताके।

काफ़िर स्वाल सुखन कूँ मोडै, काफ़िर नीच सूं जोड़े।

दोहा: - काफ़िर काफ़िर छाड़ि हूँ, सत्यवादी से नेह। गरीबदास जुग जुग पड़े, काफ़िर के मुख खेहं।

वै काफ़िर जो कन्या मारैं, वै काफ़िर जो बन खंड जारैं।

वै काफ़िर जो नारि हितांही, वै काफ़िर जो तोरैं बांही।

वै काफ़िर जो अंतर काती, वै काफ़िर जो देवल जाती।

वै काफ़िर जो डाक बजावैं, वै काफ़िर जो शीश हलावैं।

वै काफ़िर जो करें कंदूरी, वै काफ़िर जिन नहीं सबूरी।

वै काफ़िर जो बकरे खांही, वै काफ़िर नहीं साधू जिमाहीं।

वै काफ़िर जो मांस मसाली, वै काफ़िर जो मारै हाली।

वै काफ़िर जो खेती चोरं, वै काफ़िर जो मारैं मोरं।

वै काफ़िर अन भावत खांही, काफ़िर गणिका सूं गल बांही।

काफ़िर अर्ध बिंब से संगा,काफ़िर सो जो फिरै बिनंगा।

काफ़िर सो जो महीं तनावैं, जाका दूध रुधिर घर ल्यावैं।

काफ़िर जो भल भदर भेषा, जाके सिर पर बार न एका।

दोहा:- काफ़िर कीड़े नरक के, जुग जुग होत बिधंस। गरीबदास साची कहै, नहीं चीन्हत  हैं बंस।

काफ़िर सो जो मुरदी काटैं, वै काफ़िर जो सीनां चाटैं।

काफिर गूदा घतैं सलाई, काफिर हुक्का पीवै नाई।

काफिर भांग भसौड़ी भरहीं, काफिर हुक्के कूँ सर करहीं ।

काफिर घट में धूमां देहीं, काफिर नास नाक में लेहीं।

काफिर कथ सुपारी चूना, पांन लपेटि मुख में थूंना।

काफिर मालनि कूँ डर पावैं, बिन ही कीने भाजी खावैं।

काफिर सो एक अंब चिचोरैं, मजलिस बैठें मुख निपोरें।

काफिर सो जो कानी देही, काफिर सो कन्या धन लेही।

काफिर साली से साखा, काफिर बचन पलटै माँ का।

काफिर सो जो विद्या चुरावैं, काफिर भैरव भूत पुजावै।

दोहा:- पूजैं देई धाम कूँ, शीश हालावैं जोय । गरीबदास साची कहैं, हद काफिर है सोय ।

काफिर तोरै बनज व्योहारं, काफिर सो जो चोरी यारं।

काफिर सो जो बाग उपारं, काफिर सो बिन नाम अधारं।

काफिर आंन देव कूँ मानैं, काफिर गुड़ कूँ दूधैं सानैं ।

वै काफिर जो अनरुचि खांही, वै काफिर जो भूले सांई।

वै काफिर जो अंडा फोरै, काफिर सूर गऊ कूँ तोरै।

वै काफिर जो मिरगा मारै, काफिर उदर कर्द से परैं।

काफिर पीवत गऊ हटावैं, काफिर कूवे की मणि ढांवैं।

काफिर भेष भेष कूँ मारैं, काफिर कूड़ा ज्ञान पसारैं।

दोहा:- काफिर किर्ति ना लखै, दया धर्म व्यवहार। गरीबदास कैसे बचैं , जाना जम दरबार।

Speech of Supreme God Kabir on Definition of Kafir

کافر بودھ

کافر بودھ سونو ری بھائ ، دوہ دن دین بیچ رام کھڈائی۔

کافر سو ماتا دی گاری ، وا کافر جو کھیلیں ساری

کافر کوڈی ساکھ بھرانهی ، کافر چوری کھٹیا خاں ہی

References

  •  

Categories: index Tags: #knowledge, #trends